Monday, January 19, 2015

दिन बीत जाता है
 तुम्हारी यादोँ मे
 टूटते बिखरते ख्वाबोँ को सजाने मेँ
 अक्सर पाता हू भीड मे भी खुद को तन्हा
 जब चली गयी हो तुम
 तो अपनी यादे क्योँ छोड गयी हो पास मेरे
 ये ना तो जीने देती है और ना ही मरने
बस बीतता जाता है
 मेरा दिन उन्ही पुराने अहसासोँ मेँ
 ना जाने वो कौनसी अनजानी सी डोर
 जो आज भी मुझे तेरे करीब लाके खडा कर देती है
 वही चाँद वही चाँदनी
 वो साथ बिताये सुहाने पल को फिर से महसूस करने लगता हू
 फिर अचानक से ख्याल आया
 ये तो महज यादे है
 फिर एक टीस उठी दिल मे मेरे
 और एक ख्वाहिश जगी की कही मिल जाये वो
 मुझे फिर से दोबारा
 तो उससे पूछलू की क्या कसूर था मेरा... ?

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