Thursday, January 8, 2015
फिर से उठ पडी है तेरे अहसासो की बारिष मुझे याद आने लगे है कुछ पल पुराने वो तेरा हँसना मुस्कराना प्यार मेँ सबकुछ भूल जाना पर अब वो दिन नही रहे हम दूर हो गये एक दूसरे से फिर भी हमारा प्यार बढता जा रहा है मैँ आज भी महसूस करता हूँ तुम्हे उन जगहोँ पर जहां हम बैठा करते थे कभी मैँ अक्सर देख लेता हू तुम्हारी मुस्कराहट खिलते हुये फूलोँ मेँ मैँ पाता हूँ तुम्हे अपने आने जाने वाली हर साँसो मेँ मैँ महसूस कर सकता हूँ तुम्हे उन हवाओँ मे जो छू कर आती है तुम्हे हम दूर है कितने फिर भी मैँ देख लेता हूँ तुम्हे अपने आप मेँ
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धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....
क्यों धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं जीने निकले थे ज़िन्दगी को , अब उसी ज़िन्दगी को धीरे धीरे खो रहा हूं मैं यूं तो कमी ...
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भृष्टाचार आज के समय में एक बड़ी समस्या बन कर रह गया है ! आखिर क्योँ नहीं ख़त्म हो रहा भृष्टाचार क्योकि आप और हम खुद नहीं चाहते की भृष्टा...
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