Thursday, August 6, 2009
दोस्त
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धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....
क्यों धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं जीने निकले थे ज़िन्दगी को , अब उसी ज़िन्दगी को धीरे धीरे खो रहा हूं मैं यूं तो कमी ...
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भृष्टाचार आज के समय में एक बड़ी समस्या बन कर रह गया है ! आखिर क्योँ नहीं ख़त्म हो रहा भृष्टाचार क्योकि आप और हम खुद नहीं चाहते की भृष्टा...
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क्यों धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं जीने निकले थे ज़िन्दगी को , अब उसी ज़िन्दगी को धीरे धीरे खो रहा हूं मैं यूं तो कमी ...
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ये इश्क ये मोहब्बत प्यार उल्फत ना जाने क्या क्या सिखा देती है वो जब भी मिलती है मुझे अक्सर रुला देती है जब भी सोचता हू चलू अब ...
