Tuesday, September 27, 2016

शहर

कौन चाहता है अपनो से दूर होना
कम्ब्खत मजबूरिया दूर कर देती है
अपना शहर तो सबको अछ्छा लगता है
पर ज़िंदगी की उलझने
शहर छोड़ने पर मजबूर कर देती है
कौन चाहता है की परिवार साथ न हो
पर "प्रेम" आज तो पैसा
अपनो को अपनो से दूर कर देता है..

1 comment:

धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....

क्यों धीरे धीरे खुद को   खो रहा हूं मैं  जीने निकले थे  ज़िन्दगी को , अब उसी ज़िन्दगी को  धीरे धीरे खो रहा हूं मैं  यूं तो कमी ...