Wednesday, March 21, 2018

धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....

क्यों धीरे धीरे
खुद को  
खो रहा हूं मैं 
जीने निकले थे 
ज़िन्दगी को ,
अब उसी ज़िन्दगी को 
धीरे धीरे खो रहा हूं मैं 
यूं तो कमी नहीं 
मेरे पास अपनों की 
फिर क्यों "प्रेम" 
तन्हाइयो का हो रहा हूं मैं 
कभी रहे थे,
कुछ हंसी ख्वाब मेरे आँखों में भी 
आज उन्ही ख्वाबो की तलाश में
खुद को खो रहा हूं मैं 
पहले तो बहुत खुशनुमा थी 
मेरी भी ज़िन्दगी 
पर ना  जाने क्यों
अब  गमो का रहा हूं मैं 
क्यों किसी के यादो की मीरास को 
खुद के पास सहेज रहा हूं मैं?



Friday, August 18, 2017

अजीब सी उलझने है....

अजीब सी उलझने है ज़िंदगी मे 
काश वो बचपन फ़िर से मिल जाये 
आज भी याद आता है 
मुझे वो सारा दिन 
खेलकर निकल जाना
थक कर कही भी सो जाना
और सुबह खुद को 
बिस्तर पर पाना
खाना ना खाने पर
बार बार माँ का मनाना

बिना उलझनो के 
सुकून से नींद का आना
अब तो सुबह होती है
ओर रात होती है
दिन भर खुद से भी न बात होती है
इस फ़िक्र ए ज़िंदगी ने
मासुमियत ही छीन ली मेरी
अब तो फ़िर से बचपन मे
लौट जाने की आरजू होती है...


जो आशना से लोग थे .....

जो आशना से लोग थे 
वो अजनबी से हो गये 
न जाने क्यो 
ये रात और दिन भी
क्यो खफ़ा खफ़ा
 से हो गये
रात आते है
 ख्वाबो मे वो 
फ़िर भी ज़िंदगी क्यो
भी बिखरी , बिखरी सी हो गयी
जो अशना से लोग थे 
वो अजनबी से हो गये 
ऐ ज़िंदगी मेरा कसूर बता
क्यो बर्बाद किया तूने 
मुझे 
कुछ हंसी 
ख्वाबो के लियेे 
वक्त और ये रास्ते मुझसे 
अब कह रहे 
रुका है अब किसके लिये
जो था वो बित गया
फ़िर क्यो समय को ठहरा दिया खुद के
हालात क्या है देख ले 
खुद से जुदा हो गये तुम खुद के लिये
वो मंजिले वो रास्ते 

तुम्हे पुकारती है आज भी
 क्यो रुके हो 
तुम अपने यतित के लिये
आ आगे बढ और लगा गले मुझे 
फ़िर से साथ चलने के लिये..


Friday, August 11, 2017

बडे क्या हुए ख्वाब बडे हो गये..

बडे क्या हुए ख्वाब बडे हो गये
घर छूटा, वो गालिया छूटी
अपने भी पराये हो गये
आज फ़िर दवाये ले कर आया हू
कह तो दू बीमार हू पर,
 पर औफिस ना जाने के
ये सारे बहाने पुराने हो गये
सुकुन से ज़िंदगी जिये
एक जवाने हो गये
ख्वाब जो आते थे पहले
अब वो सब पुराने हो गये
कही देखा था.मैने खुद को
कुछ बिखरे हुए ख्वाबो को समेटते

खूद को गिरते और गिरकर सम्हल्ते,
अब अपनो संग समय बिताये,
जवाने हो गये
चाहता तो फ़िर से पालेता वो ज़िंदगी
पर क्या करे  प्रेम  हम सयाने हो गये !!


Monday, June 26, 2017

ये मोहब्बत....

ये इश्क
ये मोहब्बत
प्यार
उल्फत
ना जाने
क्या क्या
सिखा देती है
वो जब भी
मिलती है
मुझे अक्सर
रुला देती है
जब भी सोचता
हू चलू अब दूर
यहा से
कमबख्त तेरी यादे
मुझेफ़िर
पास बुला लेती है
"प्रेम"उसे भी है
मुझे भी है
फ़िर ये खमोशिया
क्यो बीच मे
सर उठा लेती है ?
उफफ़ ये मोहब्ब्त
भी ना जाने
क्या क्या सिखा देती है

Tuesday, September 27, 2016

मैँ, मैँ नही रहा

मैँ, मैँ नही रहा
अब ये क्या हुआ
कहाँ पहुँच गया मैँ,
यहाँ मैँ पाता हूँ
खुद को निस्क्रिय
और खोता जाता हू मै
खुद को तुममे
वो मोहब्बत
जो शायद
तुम्हे अब नही रही
फिर भी खीच लेती है
मुझे तेरे पास
फिर मै समेट लेता हू
अपने अन्दर
वो सारे पल
जो बिताये थे
साथ हमने
और महसूस करता हूँ
अपने आने जाने वाली
साँसो को
और उन साँसो मे
हर बार
तेरा नाम
और धिरे धिरे
खो देता हू
मै खुद को
खुद मे
फ़िर मै
डूब जाता हू
उस "प्रेम" मे
जो अब नही रहा.
ओर फिर
मै महसूस करता हू की

 मै  अब मै नही रहा
और
मै  हम हो गया...

शहर

कौन चाहता है अपनो से दूर होना
कम्ब्खत मजबूरिया दूर कर देती है
अपना शहर तो सबको अछ्छा लगता है
पर ज़िंदगी की उलझने
शहर छोड़ने पर मजबूर कर देती है
कौन चाहता है की परिवार साथ न हो
पर "प्रेम" आज तो पैसा
अपनो को अपनो से दूर कर देता है..

धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....

क्यों धीरे धीरे खुद को   खो रहा हूं मैं  जीने निकले थे  ज़िन्दगी को , अब उसी ज़िन्दगी को  धीरे धीरे खो रहा हूं मैं  यूं तो कमी ...