Friday, August 18, 2017

अजीब सी उलझने है....

अजीब सी उलझने है ज़िंदगी मे 
काश वो बचपन फ़िर से मिल जाये 
आज भी याद आता है 
मुझे वो सारा दिन 
खेलकर निकल जाना
थक कर कही भी सो जाना
और सुबह खुद को 
बिस्तर पर पाना
खाना ना खाने पर
बार बार माँ का मनाना

बिना उलझनो के 
सुकून से नींद का आना
अब तो सुबह होती है
ओर रात होती है
दिन भर खुद से भी न बात होती है
इस फ़िक्र ए ज़िंदगी ने
मासुमियत ही छीन ली मेरी
अब तो फ़िर से बचपन मे
लौट जाने की आरजू होती है...


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