Wednesday, March 21, 2018

धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....

क्यों धीरे धीरे
खुद को  
खो रहा हूं मैं 
जीने निकले थे 
ज़िन्दगी को ,
अब उसी ज़िन्दगी को 
धीरे धीरे खो रहा हूं मैं 
यूं तो कमी नहीं 
मेरे पास अपनों की 
फिर क्यों "प्रेम" 
तन्हाइयो का हो रहा हूं मैं 
कभी रहे थे,
कुछ हंसी ख्वाब मेरे आँखों में भी 
आज उन्ही ख्वाबो की तलाश में
खुद को खो रहा हूं मैं 
पहले तो बहुत खुशनुमा थी 
मेरी भी ज़िन्दगी 
पर ना  जाने क्यों
अब  गमो का रहा हूं मैं 
क्यों किसी के यादो की मीरास को 
खुद के पास सहेज रहा हूं मैं?



1 comment:

धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....

क्यों धीरे धीरे खुद को   खो रहा हूं मैं  जीने निकले थे  ज़िन्दगी को , अब उसी ज़िन्दगी को  धीरे धीरे खो रहा हूं मैं  यूं तो कमी ...