Thursday, November 17, 2011

"महगाई"

जी हाँ मंहगाई आज के समय में सागर के लहरों की भाँती उफान मार रही है आज हर वस्तुवों के मूल्यों में वृद्धि आ चुकी है जो वास्तु कभी दस रुपये की हुआ करती थी आज वह चालीश रुपये की है आज आंते का मूल्य अस्सी रपये में पञ्च किलो है जो की पहले पचास रुपये में हुआ करता था इसी तरह चीनी , चावल , तेल , इत्यादि वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि हो गयी है और दूसरी तरफ गैस और पेट्रोल के दाम तो आसमान छू रहे है इस मंहगाई ने तो बड़े बड़े महाजनों की कामद तोड़ दी तब आम गरीबो का क्या होगा ?
जो एक दिन में १५० रुपये कमाता है जिससे वह किसी तरफ से दो वक्त की दाल रोटी चलता है फिर भी वह अपने बच्चो को पढ़ा लिखाकर एक अच्छा भविष्य देने का सपना देखता है जो की संभव नहीं होसकता क्योंकि आज तो वस्तुओं के साथ साथ विद्यालयों के शुल्कों में भी बढ़ोतरी हो गयी जिससे उनका यह सपना सपना ही बनकर रह जता है फिर भी हमारी सरकार इसके लिए कोई उपाय सोचने में असमर्थ है

Thursday, November 10, 2011

"दिल"

मेरा दिल बेकरार है
आज किसी का इन्तजार है
आज फिर से आने वाली बाहार है
इसलिए मेरा दिल बेकरार है
आज बागो में फिर से कोयल गीत सुनाने लगी है
आज फिर से वही सुन्गान्धित
हवा बहने लगी है
सागर की लहरे फिर से
किनारों को छूने के लिए  मचंलने लगी है
आज फिर उसी बारिश का इन्तजार है
आज मिलने वाली खुशियाँ आपार है
इसलिए मेरा दिल बेकरार है 

















Monday, November 7, 2011

"कशिश "

जब याद  आती है वो
मेरे दिलो  दिमाक  में छा जाती है
मै  पाता हू उसे
अपने पास
मै महसूस कर ता हू उसे
और उन हवाओ को भी
जो छूकर कर आती है उसे
मै पाकर भी पा नहीं सकता  सकता उसे
मै देख कर भी देख नहीं सकता उसे
फिर एक अजीब सी टीस
उठती है मेरे हृदय में
फिर मै सोचता  हू
 क्यों  आती है उसकी  यादे
मै भुलाना चाहता उसको और उसकी यादों को
पर भूल नहीं पाता   हू
एक  अजीब सी कशिश है उसमे 
जो मुझे उसके  तरफ खिचती है

धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....

क्यों धीरे धीरे खुद को   खो रहा हूं मैं  जीने निकले थे  ज़िन्दगी को , अब उसी ज़िन्दगी को  धीरे धीरे खो रहा हूं मैं  यूं तो कमी ...