Thursday, December 8, 2011
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धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं ....
क्यों धीरे धीरे खुद को खो रहा हूं मैं जीने निकले थे ज़िन्दगी को , अब उसी ज़िन्दगी को धीरे धीरे खो रहा हूं मैं यूं तो कमी ...
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हम तो यह सोंच कर हैरान है की आख़िरकार वरिष्ठ ब्लॉगर कहा है ! उनका कुछ अता पता नहीं है ! क्या वरिष्ठ ब्लोग्गारो के पास नहीं बचा है कोई जवाब ! ...
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जी हाँ मंहगाई आज के समय में सागर के लहरों की भाँती उफान मार रही है आज हर वस्तुवों के मूल्यों में वृद्धि आ चुकी है जो वास्तु कभी दस रुपये की ...
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ये इश्क ये मोहब्बत प्यार उल्फत ना जाने क्या क्या सिखा देती है वो जब भी मिलती है मुझे अक्सर रुला देती है जब भी सोचता हू चलू अब ...

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